Hridayapoorvam review mohanlal:हृदयपूर्वम: मोहनलाल की भावनात्मक यात्रा, सत्यन अंथिक्काड की दिल को छूने वाली कहानी
निर्देशक सत्यन अंथिक्काड की फिल्म हृदयपूर्वम को 28 अगस्त 2025 से सिनेमाघरों में रिलीज़ किया गया है। इस फिल्म की कहानी मोहनलाल के इर्द-गिर्द घूमती है। मोहनलाल मलयालम फिल्म इंडस्ट्री का एक ऐसा चेहरा हैं, जिन्हें बॉलीवुड से लेकर साउथ तक सभी पसंद करते हैं। कुछ क्रिटिक्स इस फिल्म को दिल को छू लेने वाली कहानी बता रहे हैं। चलिए जानते हैं, क्या है फिल्म में खास।
कहानी
कहानी की शुरुआत में दिखाया गया है कि मोहनलाल, जो संदीप के किरदार में हैं, उन्हें हार्ट अटैक आ जाता है। स्थिति गंभीर होने पर संदीप को बचाने के लिए हार्ट ट्रांसप्लांटेशन की ज़रूरत पड़ती है। ऑपरेशन सफल रहता है और संदीप सामान्य ज़िंदगी में लौट आते हैं। तभी एक लड़की संदीप से मिलने आती है, क्योंकि उसी के पिता का हार्ट संदीप के शरीर में ट्रांसप्लांट किया गया है।
दिल को यह कहानी उस समय छू जाती है, जब वह लड़की संदीप से मिलती है और बताती है, “मेरे पापा का हार्ट आपके पास है, जो मेरी ज़िंदगी का अभिन्न हिस्सा था। वो कहते थे कि बेटी, मैं तुम्हारे दुख-सुख में हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगा। अब मेरी सगाई होने वाली है और मैं चाहती हूं कि आप उस समय मेरे साथ रहें, मुझे बहुत अच्छा लगेगा।”
संदीप इस प्रस्ताव को ठुकरा देता है, लेकिन बाद में इसके बारे में बहुत सोचता है। क्या संदीप उस लड़की की सगाई में पुणे जाता है? वहां जाकर उसे किन-किन भावनात्मक पलों से गुजरना पड़ता है? यही सब फिल्म में आगे देखने को मिलता है।
फिल्म का क्लाइमेक्स कुछ इस तरह गढ़ा गया है, जिसका अंदाज़ा लगाना थोड़ा मुश्किल था। यही फिल्म का प्लस पॉइंट है, जो इसे यूनिक बनाता है।

पॉजिटिव पॉइंट्स
शुरुआत में इसकी कहानी शायद थोड़ी धीमी लगे, जो फिल्मों के लिए आम बात है, लेकिन बाद में यह पानी की धारा की तरह बहने लगती है और सभी दर्शकों को अपने में डुबो देती है। तमिल फिल्म इंडस्ट्री की एक फिल्म नी वरुवाय नाम की थी, जो एक रोमांटिक ड्रामा थी और 1999 में रिलीज़ हुई थी। उसमें मनोरंजन के साथ भरपूर इमोशन परोसा गया था। कुछ-कुछ उसी तरह हृदयपूर्वम भी है।
कहानी में जिस तरह इमोशन्स के साथ कॉमेडी को जोड़ा गया है, वह देखने में काफी अच्छा लगता है। एक सीन में हीरो की शादी रुक जाना और हीरोइन का उसे बार-बार फोन करना देखने में बड़ा मज़ेदार था। फिल्म का पहला हिस्सा काफी मज़ेदार है, वहीं अगर दूसरे हिस्से की बात करें तो कभी-कभी ऐसा लगता है कि इसमें ज़रूरत से ज़्यादा सीन डाले गए हैं। सिद्धिक, बाबूराज और लालू एलेक्स को अगर थोड़े और सीन दिए जाते, तो शायद दर्शक इन किरदारों से और जुड़ सकते थे।

मलयालम फिल्म इंडस्ट्री की सबसे खास बात यह है कि यह अपनी फिल्मों की शूटिंग स्टूडियो में कम और लाइव लोकेशन पर ज़्यादा करती है। इस फिल्म की शूटिंग भी पुणे की लाइव लोकेशन पर की गई है। पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट का नाम आपने बहुत सुना होगा, यहां भी इसके कई सीन शूट किए गए हैं।
यहां कुछ ऐसे सीन देखने को मिलते हैं, जो सिर्फ मलयालम सिनेमा ही दिखा सकता है। पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट में एक लड़का मोहनलाल से मिलता है और कहता है, “आप केरल से हैं, मुझे फहद फ़ाज़िल की एक्टिंग बहुत पसंद है।” मोहनलाल उस लड़के से कहते हैं, “हमारे पास और भी सीनियर एक्टर हैं।” लेकिन वह लड़का कहता है, “नहीं-नहीं, बस फहद फ़ाज़िल।” इसके बाद मोहनलाल असहज हो जाते हैं और उसके द्वारा दिया गया प्रसाद उसे लौटा देते हैं।
70 वर्ष की उम्र में निर्देशक सत्यन अंथिक्काड ने ऐसी फिल्म बनाई है, जिससे हम आसानी से खुद को जोड़ लेते हैं।
निष्कर्ष
कहानी सीधी-सादी और भोली-भाली है। निर्देशक ने इसके माध्यम से जो कहना चाहा, वह साफ दिखाई देता है। एक अच्छा स्क्रीनप्ले और टाइट एडिटिंग फिल्म का प्लस पॉइंट है। बहुत ज़्यादा उम्मीद किए बिना इसे एक बार देखें, यह फील-गुड करवा सकती है। मेरी तरफ से इसे 5 में से 3.5 स्टार की रेटिंग।
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